श्री जेठू बाबा जी का पावन जीवन चरित्र
नसीबपुर की पावन धरा पर विराजमान सिद्ध शिरोमणि श्री जेठू बाबा जी का इतिहास त्याग, तपस्या और जन-कल्याण की अनूठी मिसाल है। लगभग तीन सौ वर्षों से यह स्थान श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। आइए जानते हैं बाबा के जन्म से लेकर समाधि तक की संपूर्ण अलौकिक गाथा।

1. जन्म और बाल्यकाल: वैराग्य की ओर पहला कदम
श्री जेठू जी का जन्म आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व ग्राम कलवाडी (Kalwadi) के एक प्रतिष्ठित अहीर (यादव) परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका मन सांसारिक खेलों की बजाय गौ-सेवा में रमता था।
गौ-प्रेम: बालक जेठू प्रतिदिन सुबह-शाम गायों को चराने जंगल (बणी) में ले जाते थे, जिससे उन्हें अपार आत्मिक सुख मिलता था।
गृह त्याग: अभी उनकी अवस्था मात्र 12 वर्ष की थी, जब माता-पिता की किसी बात पर ताड़ना (डांट) मिलने के कारण उनका मन खिन्न हो गया। उन्होंने घर-बार त्याग दिया और हुडिया (Hudia) के मंदिर में आ गए। यहाँ भी उन्होंने गौ-सेवा का नियम नहीं छोड़ा।
2. गुरु मिलन और शक्तियों की प्राप्ति
हुडिया में एक दिन गाय चराते समय एक अद्भुत घटना घटी। उनकी एक गाय झुंड से अलग होकर पहाड़ की ओर चल दी। बालक जेठू भी उसके पीछे-पीछे एक गुफा में प्रवेश कर गए।
तेजस्वी महात्मा: गुफा के भीतर एक महात्मा तपस्या में लीन थे, जिनके मुख से तेज टपक रहा था। जेठू जी को देखते ही महात्मा ने कहा, 'अरे! तू तो बहुत दिनों में आया है, मैं तो तेरी ही बाट देख रहा था।'
दीक्षा: बालक जेठू ने उनके चरण पकड़ लिए। महात्मा ने पूछा, 'तेरा नाम क्या है?' उन्होंने उत्तर दिया, 'जेठू'। महात्मा ने उन्हें आशीर्वाद देकर विदा किया।
महंत का निर्णय: जब जेठू जी वापस मंदिर आए, तो मंदिर के महंत ने उनकी बढ़ी हुई आभा पहचान ली। महंत ने कहा, 'अब एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। तुम्हारी शक्ति मुझसे अधिक हो गई है, अतः यह स्थान तुम संभालो।' अपने गुरु के आदेश और चरण स्पर्श के बाद जेठू जी हुडिया से आगे की यात्रा पर निकल पड़े।
3. नसीबपुर आगमन: भक्त की रक्षा
हुडिया से चलकर बाबा पहले ताजपुर आए (जहाँ तालाब बनवाया), फिर खालड़ा आए (जहाँ योग साधना की और जोहड़ खुदवाया)। नसीबपुर में उनके आगमन के पीछे एक चमत्कारिक कथा है:
भक्त की पुकार: नसीबपुर गाँव की एक महिला प्रतिदिन बाबा के लिए भोजन लेकर खालड़ा जाती थी। एक दिन रास्ते में चार बदमाशों ने उस असहाय महिला को घेर लिया और अपशब्द कहे।
चमत्कार: बाबा की शक्ति से वे चारों बदमाश तत्काल दृष्टिहीन (अंधे) हो गए और रोने लगे। जब महिला बाबा के पास पहुंची, तो बाबा ने कहा, 'माई! अब हम तेरे गाँव चलकर ही भोजन करेंगे।' इस प्रकार भक्त के प्रेमवश बाबा नसीबपुर आ गए और यहीं अपना स्थायी आसन जमाया।
4. मंदिर निर्माण और मजदूरों की परीक्षा
नसीबपुर आकर बाबा ने तपस्या के साथ-साथ जन-कल्याण हेतु एक जौहड़ (सरोवर) खुदवाना शुरू किया।
चमत्कारिक मजदूरी: बाबा शाम को मजदूरों को धरती से पैसे निकालकर मजदूरी देते थे।
मजदूरों का लोभ: एक दिन मजदूरों ने सोचा कि बाबा खजाना यहीं से निकालते हैं, क्यों न रात में हम ही निकाल लें? वे रात भर खुदाई करते रहे, पर हाथ कुछ नहीं लगा। अगले दिन बाबा ने मुस्कराते हुए उन्हें 'दुगनी मजदूरी' दी और क्षमा कर दिया। मजदूरों ने लज्जित होकर बाबा के चरणों में गिरकर माफी मांगी।
प्राण प्रतिष्ठा: उसी समय गाँव वालों के सहयोग से जोहड़ के पास मंदिर का निर्माण हुआ। बाबा ने अपने पास रखी भगवान नृसिंह की मूर्ति की विद्वान ब्राह्मणों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा करवाई।
5. बाबा के प्रमुख चमत्कार
(क) डूबती नाव को बचाना
एक बार एक सेठ की नाव नदी के गहरे जल में डूब रही थी। बचने का कोई उपाय न देख, एक जानकार के कहने पर सेठ ने नसीबपुर वाले जेठू बाबा को याद किया। इधर नसीबपुर में बाबा चौपड़ खेल रहे थे। अचानक उन्होंने कहा, 'मेरी तबीयत ठीक नहीं है,' और कंबल ओढ़ लिया। कुछ देर बाद जब कंबल हटाया गया, तो बाबा की पीठ से खून बह रहा था। उन्होंने अपनी पीठ पर उस डूबती नाव का भार सहकर उसे किनारे लगाया था।
(ख) मुकदमे में जीत
अटेली मंडी के पास गढ़ी गाँव के एक लाला जी झूठे मुकदमे में फंस गए थे। पटिकरा गाँव के मुनीम की सलाह पर उन्होंने जेठू बाबा को याद किया और मन्नत मांगी। बाबा की कृपा से वे असंभव लगने वाला मुकदमा जीत गए। उनके वंशज आज भी 'बावनी द्वादशी' को बाबा की समाधि पर धोक लगाने आते हैं।
6. जीवित समाधि
- तिथि: संवत 1848, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (बावनी द्वादशी)
- समय: ब्रह्म मुहूर्त
बाबा ने अपने ही हाथों से बनवाए गए जोहड़ के किनारे जीवित समाधि ली। आज 200 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बाबा की शक्ति यहाँ कण-कण में विद्यमान है।
7. जीर्णोद्धार एवं वर्तमान स्वरूप
समय के साथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य संवत (विक्रमी) 1992 में छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) निवासी स्व. सेठ श्री शिवकरण दास जी ने करवाया। मंदिर की पूजा का भार पं. सुन्दर दास जी को सौंपा गया था। आज भी उनके वंशज पूरी निष्ठा से यह कार्य संभाल रहे हैं।
महत्वपूर्ण सूचना
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